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Acharya Shri Shanti Sagar Maharaj

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बीसवीं शताब्दी के प्रथम आचार्य

चारित्र चक्रवर्ती प्रथमाचार्य १०८ श्री शांतिसागर जी महाराज

संक्षिप्त परिचय'

स्वस्ति श्री मूलसंघ में कुन्दकुन्दाम्नाय, सरस्वती गच्छ, बलात्कार गण में बीसवीं शताब्दी में प्रथम दिगम्बर जैनाचार्य-चारित्र चक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज हुए हैं। जिनका संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत है-

जन्म - आषाढ़ बदी ६, सन् १८७२

निवास स्थान - भोजग्राम (जिला-बेलगाँव) कर्नाटक

नाम - सातगौंडा पाटिल

माता-पिता - माता-सत्यवती, पिता-भीमगौंडा पाटिल

क्षुल्लक दीक्षा - ज्येष्ठ शु. १३, सन् १९१४

ग्राम-उत्तूर (जि. कोल्हापुर) महाराष्ट्र

दीक्षा गुरु - मुनि १०८ श्री देवेन्द्रकीर्ति जी महाराज

ऐलक दीक्षा - सन् १९१७ गिरनार क्षेत्र, स्वयं भगवान के चरण सानिध्य में

मुनि दीक्षा - फाल्गुन शु. १४, सन् १९२०

ग्राम-येरनाल (जिला-बेलगांव) कर्नाटक

दीक्षा गुरु - मुनि श्री १०८ देवेन्द्रकीर्ति जी महाराज

आचार्य पद - आश्विन शु. ११, सन् १९२४ ग्राम-समडोली (जिला-सांगली-महाराष्ट्र)द्वारा-चतुर्विध संघ

चारित्र चक्रवर्ती पद- सन् १९३७ गजपंथा सिद्धक्षेत्र (महा.)

समाधिमरण - द्वि. भाद्रपद शु. २, सन् १९५५, कुंथलगिरि (सिद्धक्षेत्र)

आचार्य देव ने अनेक दीक्षाएँ देकर चतुर्विध संघ सहित दक्षिण से उत्तर और पूर्व से पश्चिम तक सारे भारत में मंगल विहार करके दिगम्बर जैन मुनि परंपरा को पुनरुज्जीवित किया। अनेक तीर्थों पर जिनप्रतिमाएँ स्थापित करायीं, षट्खण्डागम ग्रंथ को ताम्रपट्ट पर उत्कीर्ण कराकर तथा विद्वानों से उनका हिन्दी अनुवाद करवाकर पुस्तकों के रूप में भी प्रकाशित करवाकर जिनवाणी को स्थायित्व प्रदान किया। ऐसे बहुत से जिनधर्म प्रभावना के कार्यों से इस भूतल पर अपने यश को चिरस्थायी कर दिया। आपने अंत में वुंथलगिरि क्षेत्र पर सल्लेखना लेकर अपने जीवनकाल में अपना आचार्यपद अपने प्रथम शिष्य मुनि श्री वीरसागर को प्रदान किया था। पुन: उनकी परम्परा में द्वितीय पट्टाचार्य श्री शिवसागर मुनिराज हुए, तृतीय पट्टाचार्य श्री धर्मसागर महाराज, चतुर्थ पट्टाचार्य श्री अजितसागर महाराज, पंचम पट्टाचार्य श्री श्रेयांससागर महाराज हुए हैं पुन: आचार्य श्री श्रेयांससागर जी महाराज की सन् १९९२ में समाधि होने के पश्चात् उनके पट्ट पर आचार्यश्री अभिनंदनसागर महाराज हुए हैं, जो वर्तमान पट्टाचार्य (छठे पट्टाचार्य) के रूप में चतुर्विध संघ का संचालन करते हुए जिनधर्म की प्रभावना कर रहे हैं।